Uttrakhand FDA कोडीन को लेकर राज्य में बड़ी कार्यवाही
राजधानी की बड़ी दवा निर्माता कंपनी के उत्पादन को किया गया सस्पेंड
2020 में इस कंपनी को GMP उलंघन को लेकर अमेरिका FDA से मिल चुकी है चेतावनी
देहरादून। उत्तराखंड खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने एक बड़ी नियामक कार्रवाई करते हुए देहरादून के मोहबेवाला औद्योगिक क्षेत्र स्थित विंडलास बायोटेक प्राइवेट लिमिटेड इकाई में कोडीन युक्त कफ सिरप के उत्पादन को निलंबित कर दिया है।
यह कार्रवाई औचक निरीक्षण में कंपनी के संचालन में गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद की गई। साथ ही संबंधित विनिर्माण लाइसेंस को अगली सूचना तक निलंबित कर दिया गया है।
Uttrakhand FDA आयुक्त सचिन कुर्वे के निर्देश पर किया गया, जिसकी निगरानी अतिरिक्त आयुक्त ताजभर सिंह जग्गी ने की।
अधिकारियों के अनुसार, इकाई में निर्मित कुछ दवाएं निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरीं और लाइसेंस शर्तों का उल्लंघन पाया गया।
इन कमियों को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सीधा खतरा माना गया, विशेषकर कोडीन आधारित दवाओं के दुरुपयोग की आशंका को देखते हुए।
कोडीन एक नारकोटिक एनाल्जेसिक और कफ सप्रेसेंट है, जिसे भारत में शेड्यूल H1 तथा एनडीपीएस अधिनियम के तहत सख्ती से नियंत्रित किया जाता है।
इसकी नशे की प्रवृत्ति और अवैध उपयोग की घटनाओं के कारण राज्य सरकार ने कोडीन सिरप और अन्य मन:प्रभावी पदार्थों के दुरुपयोग पर शून्य सहनशीलता नीति अपनाई हुई है।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि नियम उल्लंघन, लाइसेंस शर्तों के हनन या किसी भी अवैध गतिविधि पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
एफडीए ने जिला स्तर के औषधि अधिकारियों को सतर्कता बढ़ाने, विशेष दल गठित करने तथा नियमित व औचक निरीक्षण तेज करने के निर्देश दिए हैं।
यह कदम देशभर में कोडीन आधारित कफ सिरप के अवैध व्यापार और डायवर्जन पर लगाम लगाने के व्यापक प्रयासों के अनुरूप माना जा रहा है।
रिपोर्ट में जब्त उत्पादों की मात्रा या गिरफ्तारी का तत्काल उल्लेख नहीं किया गया है, हालांकि निलंबन के कारण संबंधित कफ सिरप का उत्पादन फिलहाल पूरी तरह बंद रहेगा और आगे की जांच के बाद ही अगला निर्णय लिया जाएगा।
गौरतलब है कि विंडलास बायोटेक को वर्ष 2020 में इसी इकाई से जुड़े गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस (GMP) उल्लंघनों को लेकर अमेरिकी एफडीए की चेतावनी का भी सामना करना पड़ा था।
ताजा कार्रवाई नियंत्रित दवाओं के निर्माण से जुड़े फार्मा प्रतिष्ठानों पर बढ़ते नियामकीय दबाव को दर्शाती है।

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